ईरान ने एक बार फिर मध्य पूर्व की शतरंज की बिसात पर ऐसी चाल चली है जिसने वाशिंगटन से लेकर बीजिंग तक सबको सोचने पर मजबूर कर दिया है। जब दुनिया की नजरें डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की संभावित मुलाकात और अमेरिका-चीन के बीच बढ़ते तनाव पर टिकी हैं, तब तेहरान ने दर्जनों चीनी जहाजों को सुरक्षित रास्ता (Safe Passage) देने का फैसला सुनाया है। ये महज एक इत्तेफाक नहीं है। ये सोची-समझी रणनीति है। ईरान ये दिखाना चाहता है कि वो क्षेत्र का असली 'पावर ब्रोकर' है और उसके पास लाल सागर से लेकर ओमान की खाड़ी तक की चाबी है।
ईरान का ये कदम सीधे तौर पर उन पश्चिमी पाबंदियों को चुनौती देता है जो उसकी अर्थव्यवस्था का गला घोंटने की कोशिश कर रही हैं। असल में, जब आप वैश्विक शिपिंग रूट को कंट्रोल करने की क्षमता रखते हैं, तो आप सिर्फ तेल नहीं बेच रहे होते। आप रसूख बेच रहे होते हैं। चीन के लिए ये एक बड़ी राहत है, क्योंकि उसके अरबों डॉलर का व्यापार इन्हीं समुद्री रास्तों पर निर्भर है। लेकिन सवाल ये है कि क्या ट्रंप इस 'ईरान-चीन नेक्सस' को चुपचाप देखते रहेंगे?
ईरान की नई चाल और शिपिंग रूट का गणित
ईरान के इस फैसले का सबसे बड़ा असर लाल सागर और स्वेज नहर के जरिए होने वाले व्यापार पर पड़ेगा। हूती विद्रोहियों के हमलों ने पहले ही इस रास्ते को खतरनाक बना दिया था। अब ईरान ने चीन समेत कई देशों के जहाजों को सुरक्षा की गारंटी दी है। इसका मतलब साफ है कि ईरान ये तय करेगा कि समंदर में किसका जहाज डूबेगा और किसका सुरक्षित निकलेगा।
ये कोई साधारण एस्कॉर्ट सर्विस नहीं है। ईरान अपनी 'प्रॉक्सिबिलिटी' का फायदा उठाकर चीन को ये एहसास दिला रहा है कि अमेरिका भले ही बड़ा बाजार हो, लेकिन सामान पहुंचाने के लिए तेहरान की दोस्ती जरूरी है। इस रणनीति से ईरान को दो फायदे हो रहे हैं। पहला, उसे चीन के रूप में एक मजबूत आर्थिक और राजनीतिक ढाल मिल रही है। दूसरा, वो अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी अलग-थलग पड़ी छवि को 'क्षेत्रीय रक्षक' के तौर पर पेश कर रहा है।
ईरान के सरकारी मीडिया और सैन्य अधिकारियों के बयानों को देखें तो पता चलता है कि ये सुरक्षा गारंटी उन जहाजों के लिए है जो ईरान के हितों को चोट नहीं पहुंचा रहे। ये एक तरह का अनकहा 'नॉन-अग्रेशन पैक्ट' है। अगर आप ईरान के साथ व्यापार करते हैं या उसके पाले में खड़े हैं, तो आपके कार्गो सुरक्षित हैं। नहीं तो, समंदर में कब क्या हो जाए, इसकी कोई गारंटी नहीं।
ट्रंप और जिनपिंग की मुलाकात पर मंडराता साया
डोनाल्ड ट्रंप की वापसी के बाद से ही तेहरान में बेचैनी है। ट्रंप की 'मैक्सिमम प्रेशर' वाली नीति ईरान को अच्छे से याद है। वहीं दूसरी तरफ, चीन और अमेरिका के बीच व्यापार युद्ध (Trade War) का नया दौर शुरू होने वाला है। ट्रंप और जिनपिंग की मुलाकात से पहले ईरान ने ये पत्ता फेंककर मेज पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा दी है।
चीन को सुरक्षा का भरोसा देकर ईरान ने बीजिंग को एक तरह से अपनी तरफ खींच लिया है। अगर ट्रंप ईरान पर और कड़े प्रतिबंध लगाते हैं, तो चीन के लिए उन प्रतिबंधों का समर्थन करना मुश्किल होगा। क्यों? क्योंकि चीन का व्यापार ईरान के दिए गए इसी 'सेफ पैसेज' पर टिका है। ये ईरान की तरफ से अमेरिका के लिए एक सीधा मैसेज है कि आप हमें नजरअंदाज करके एशिया या मध्य पूर्व की नीति नहीं बना सकते।
ईरान को पता है कि चीन उसकी लाइफलाइन है। चीन ईरान से भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है, अक्सर अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग सिस्टम को दरकिनार करके। अब जहाजों को सुरक्षा देना इस रिश्ते को और गहरा करने की कोशिश है। ये कूटनीति कम और अस्तित्व की लड़ाई ज्यादा है।
क्या ये वैश्विक सप्लाई चेन के लिए अच्छी खबर है
सतह पर देखें तो लगेगा कि जहाजों को सुरक्षा मिलना व्यापार के लिए अच्छा है। कम से कम समुद्री डाकुओं और मिसाइल हमलों का डर तो कम होगा। लेकिन इसकी गहराई में जाएं तो ये एक खतरनाक मिसाल पेश करता है। अगर शिपिंग रूट्स का कंट्रोल किसी एक देश की मर्जी पर चलने लगे, तो ग्लोबल फ्री ट्रेड का क्या होगा?
- बीमा की कीमतें: इंश्योरेंस कंपनियां अभी भी इन रास्तों को हाई-रिस्क जोन मानती हैं। ईरान की गारंटी से कागजों पर जोखिम कम हो सकता है, लेकिन जमीनी हकीकत नहीं बदली।
- रूट का डायवर्जन: जो जहाज ईरान की 'गुड बुक्स' में नहीं हैं, उन्हें अभी भी अफ्रीका के नीचे से लंबा रास्ता तय करना पड़ रहा है। इससे लागत बढ़ रही है।
- चीन का वर्चस्व: चीन के जहाजों को प्राथमिकता मिलने से वैश्विक बाजार में चीनी सामान और भी प्रतिस्पर्धी हो जाएगा, जो पश्चिमी देशों के लिए सिरदर्द है।
ये स्थिति वैश्विक व्यापार में एक तरह का 'डिजिटल डिवाइड' जैसा 'फिजिकल डिवाइड' पैदा कर रही है। एक तरफ वो देश हैं जो ईरान और चीन के प्रभाव में हैं, और दूसरी तरफ वो जो अमेरिका और उसके सहयोगियों के साथ खड़े हैं।
क्षेत्र में भारत और अन्य खिलाड़ियों की बढ़ती चिंता
भारत के लिए ये स्थिति काफी पेचीदा है। चाबहार बंदरगाह में निवेश के बावजूद, भारत को ये देखना होगा कि ईरान का ये नया झुकाव उसकी अपनी एनर्जी सिक्योरिटी को कैसे प्रभावित करता है। भारत को भी फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी में अपने जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी है। अगर ईरान सिर्फ चीन को 'VVIP' ट्रीटमेंट देता है, तो बाकी देशों के जहाजों के लिए खतरा बना रहेगा।
सऊदी अरब और यूएई जैसे देश भी इस घटनाक्रम को बारीकी से देख रहे हैं। वो नहीं चाहते कि ईरान इस इलाके का इकलौता थानेदार बन जाए। हालांकि हाल के दिनों में सऊदी और ईरान के रिश्तों में थोड़ी नरमी आई है, लेकिन जहाजों के सुरक्षा रूट पर ईरान का एकाधिकार किसी को भी हजम नहीं होगा।
ईरान ने जो चाल चली है, वो दरअसल एक बड़ा जुआ है। अगर ट्रंप प्रशासन ने इसे उकसावे की कार्रवाई माना, तो तनाव और बढ़ सकता है। लेकिन अगर चीन ने इस गारंटी को अपनी डिप्लोमैटिक जीत मान लिया, तो ईरान को आर्थिक संजीवनी मिल सकती है।
आपको क्या ध्यान रखना चाहिए
अगर आप ग्लोबल मार्केट्स या जियोपॉलिटिक्स पर नजर रखते हैं, तो आने वाले हफ्तों में कच्चे तेल की कीमतों और शिपिंग फ्रेट रेट्स को ट्रैक करें। ईरान का ये सुरक्षित रास्ता देना कोई चैरिटी नहीं है। ये एक ट्रांजेक्शन है। चीन को इसके बदले में ईरान को बड़ी रियायतें देनी होंगी, चाहे वो तकनीक हो या निवेश।
अगली बार जब आप चीन और अमेरिका के बीच ट्रेड वॉर की खबरें पढ़ें, तो याद रखिएगा कि उसकी एक कड़ी ईरान के पास भी है। शिपिंग रूट्स का ये खेल अभी और उलझने वाला है। आप बस इतना कर सकते हैं कि इस सप्लाई चेन की राजनीति को समझें और देखें कि आपके बिजनेस या निवेश पर इसका सीधा असर क्या पड़ रहा है। ईरान ने अपनी चाल चल दी है, अब देखना ये है कि व्हाइट हाउस और बीजिंग इसका क्या जवाब देते हैं।
लाल सागर में बढ़ते तनाव को देखते हुए अपनी लॉजिस्टिक्स प्लानिंग में बफर समय बढ़ाएं। किसी एक रूट पर निर्भरता कम करना ही इस वक्त की सबसे बड़ी समझदारी है। ईरान की ये 'सुरक्षा' किसी भी वक्त राजनीतिक सौदेबाजी की भेंट चढ़ सकती है।