नॉर्वे की पत्रकार को पीएम मोदी के जवाब न देने पर विदेश मंत्रालय का वो बयान जिसने पूरी बहस बदल दी

नॉर्वे की पत्रकार को पीएम मोदी के जवाब न देने पर विदेश मंत्रालय का वो बयान जिसने पूरी बहस बदल दी

भारतीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मीडिया का रिश्ता हमेशा से उतार-चढ़ाव भरा रहा है। जब भी विदेशी मंचों पर भारत के आंतरिक मामलों को लेकर सवाल उठते हैं, दिल्ली का राजनीतिक पारा चढ़ जाता है। हाल ही में एक ऐसा ही वाकया सामने आया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नॉर्वे की एक पत्रकार के बीच बातचीत की चर्चा तेज हुई। पत्रकार के सवाल और उस पर पीएम मोदी की चुप्पी को लेकर सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा की मीडिया तक में तरह-तरह की बातें की गईं। बात इतनी बढ़ गई कि भारत के विदेश मंत्रालय को खुद सामने आकर इस पर सफाई देनी पड़ी। विदेश मंत्रालय का यह रुख सिर्फ एक जवाब नहीं था, बल्कि यह भारत की उस नई कूटनीतिक रणनीति को दिखाता है जहां देश बाहरी दबावों के सामने झुकने से साफ मना करता है।

इस पूरे विवाद की जड़ में विदेशी मीडिया का भारत के प्रति एक खास नजरिया है। विदेश मंत्रालय ने साफ तौर पर कहा कि अगर किसी को भी भारत की व्यवस्था, नीतियों या फैसलों से कोई परेशानी है तो उसके लिए देश में अदालतें मौजूद हैं। कोर्ट जाने का रास्ता सबके लिए खुला है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बेहद सख्त और स्पष्ट शब्दों में विदेशी पत्रकारों को यह याद दिलाया कि भारत एक संप्रभु लोकतांत्रिक देश है और यहां की न्यायपालिका पूरी तरह स्वतंत्र है। किसी भी बाहरी एजेंसी या पत्रकार को यह हक नहीं मिल जाता कि वह भारत की आंतरिक नीतियों पर फैसला सुनाए।

विदेशी मीडिया का एजेंडा और भारत का सख्त रुख

अक्सर देखा गया है कि पश्चिमी देशों के पत्रकार भारत के आंतरिक मुद्दों जैसे मानवाधिकार, प्रेस की आजादी या नागरिकता कानूनों पर सवाल उठाते समय एक खास तरह का पूर्वाग्रह रखते हैं। नॉर्वे की पत्रकार के मामले में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला। जब प्रधानमंत्री ने उस सवाल पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दी, तो इसे विदेशी मीडिया में एक बड़े मुद्दे के रूप में उछाला गया।

भारत का विदेश मंत्रालय अब ऐसे मामलों में रक्षात्मक रवैया नहीं अपनाता। मंत्रालय ने साफ कर दिया कि भारत में कानून का राज है। देश का संविधान हर नागरिक को अधिकार देता है और अगर कहीं भी किसी नियम का उल्लंघन होता है, तो देश की अदालतें उस पर संज्ञान लेने के लिए पूरी तरह सक्षम हैं। किसी भी वैश्विक मंच पर खड़े होकर भारत को उपदेश देने की कोशिश अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह बदलाव भारत की विदेश नीति में पिछले कुछ वर्षों में साफ देखा गया है।

क्या वाकई विदेशी पत्रकारों के सवाल निष्पक्ष होते हैं

यह सवाल हर भारतीय के मन में उठता है। जब भी भारतीय नेता विदेश दौरे पर जाते हैं, तो वहां के मीडिया का ध्यान भारत की आर्थिक प्रगति, तकनीकी विकास या वैश्विक कूटनीति में बढ़ते कदम पर कम और विवादित मुद्दों पर ज्यादा होता है। विदेश मंत्रालय ने अपने बयान से यह संदेश दिया है कि भारतीय लोकतंत्र को किसी बाहरी सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है।

  • भारत का चुनाव आयोग पूरी तरह स्वतंत्र काम करता है।
  • देश की न्यायपालिका सरकार के फैसलों की भी समीक्षा करती है।
  • भारतीय मीडिया में सरकार की आलोचना खुलकर की जाती है।

जब देश के भीतर ही आत्म-सुधार और निगरानी के इतने मजबूत तंत्र मौजूद हैं, तो किसी विदेशी पत्रकार के चुनिंदा और प्रेरित सवालों का जवाब देना सरकार के लिए जरूरी नहीं रह जाता। विदेश मंत्रालय का 'कोर्ट जाओ' वाला बयान इसी आत्मविश्वास को झलकाता है।

वैश्विक कूटनीति में बदलता भारत का अंदाज

पहले के समय में जब भी विदेशी मीडिया भारत पर उंगली उठाता था, तो दिल्ली में बैठे अधिकारी बेहद नपे-तुले और बचाव वाले बयान जारी करते थे। चीजें बदल चुकी हैं। अब भारत सीधे शब्दों में बात करता है। विदेश मंत्रालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और हमारी अपनी एक स्थापित व्यवस्था है। हम किसी भी देश या उसकी मीडिया के सामने जवाबदेह नहीं हैं, सिवाय अपने देश की जनता और संविधान के।

यह कूटनीतिक आक्रामकता दर्शाती है कि भारत अब वैश्विक मंचों पर अपनी शर्तों पर खेल रहा है। चाहे यूक्रेन संकट पर भारत का रुख हो, या फिर पश्चिमी देशों द्वारा मानवाधिकारों के नाम पर घेरे जाने का प्रयास, हर बार भारत ने करारा जवाब दिया है। नॉर्वे की पत्रकार को मिला यह परोक्ष जवाब भी इसी कड़ी का हिस्सा है।

आगे का रास्ता और हमारी जिम्मेदारी

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को प्रभावित करने के प्रयास चलते रहेंगे। विदेशी मीडिया अक्सर सनसनीखेज खबरों और एकतरफा बयानों के जरिए अपनी टीआरपी और एजेंडा तय करता है। ऐसे में भारतीय नागरिकों और मीडिया को भी इस खेल को समझने की जरूरत है। देश की संप्रभुता और न्याय प्रणाली पर भरोसा रखना सबसे महत्वपूर्ण है।

अगर आपको भी लगता है कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया के इन हमलों का मुकाबला कैसे किया जाए, तो सबसे पहला कदम है तथ्यों को सही तरीके से समझना। विदेशी रिपोर्ट्स पर आंख मूंदकर भरोसा करने के बजाय देश की कानूनी और संवैधानिक व्यवस्था पर नजर रखें। सोशल मीडिया पर चल रहे भ्रामक अभियानों का हिस्सा बनने से बचें और जब भी देश के आत्मसम्मान की बात आए, तो एक सुर में खड़े होना सीखें। यही इस समय की सबसे बड़ी जरूरत है।

DT

Diego Torres

With expertise spanning multiple beats, Diego Torres brings a multidisciplinary perspective to every story, enriching coverage with context and nuance.