कागज़ पर लिखी शांति और ज़मीन पर गिरते बमों में बहुत फर्क होता है। लेबनान इस कड़वे सच को हर दिन जी रहा है। युद्ध विराम या सीज़फायर की घोषणाएं अक्सर हेडलाइंस बनती हैं। लोग राहत की सांस लेते हैं। लेकिन मिडिल ईस्ट के मौजूदा हालात बताते हैं कि समझौते सिर्फ बयानों तक सीमित हैं। लेबनान में सीज़फायर के बावजूद नहीं रुक रहे इज़रायल के हमले इस बात का साक्ष्य हैं कि शांति अभी बहुत दूर है। वहां तबाही का मंजर लगातार भयानक होता जा रहा है।
अकेले लेबनान में जान गंवाने वालों का आंकड़ा 3,000 के पार पहुंच चुका है। यह कोई मामूली संख्या नहीं है। इनमें बच्चे, महिलाएं और आम नागरिक शामिल हैं। जब हम इन आंकड़ों को देखते हैं, तो समझ आता है कि युद्ध कभी किसी का सगा नहीं होता। लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय और संयुक्त राष्ट्र (UN) की रिपोर्ट्स बताती हैं कि विस्थापन और मौतों का यह सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा। लोग अपने ही देश में शरणार्थी बन चुके हैं।
समझौते के बाद भी क्यों बरस रहे हैं बम
यह सवाल हर किसी के मन में है। जब दोनों पक्ष युद्ध रोकने पर सहमत हुए, तो फिर हमले क्यों हो रहे हैं? असल में इज़रायल का रुख बेहद आक्रामक है। उसका साफ़ कहना है कि जब तक उसके सुरक्षा लक्ष्य पूरे नहीं होते, वह कार्रवाई नहीं रोकेगा। इज़रायली डिफेन्स फोर्सेज (IDF) का दावा है कि वे सिर्फ हिजबुल्लाह के ठिकानों को निशाना बना रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। हमलों की जद में रिहायशी इलाके भी आ रहे हैं।
शांति समझौते अक्सर शर्तों के जाल में फंस जाते हैं। इज़रायल चाहता है कि हिजबुल्लाह दक्षिणी लेबनान से पूरी तरह पीछे हट जाए। वह लिटानी नदी के पार चला जाए। दूसरी तरफ हिजबुल्लाह इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानता है। जब दोनों पक्षों के बीच इस कदर अविश्वास हो, तो सीज़फायर का उल्लंघन होना तय है। नतीजा आम जनता भुगत रही है। बेरुत की सड़कों पर मलबा बिखरा है। अस्पताल घायलों से पटे पड़े हैं। दवाओं की भारी कमी हो चुकी है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस पूरे मामले पर नजर बनाए हुए है। संयुक्त राष्ट्र शांति सेना (UNIFIL) लेबनान में तैनात है। मगर उनके पास भी इन हमलों को रोकने की कोई वास्तविक शक्ति नहीं दिखती। वे सिर्फ रिपोर्ट्स तैयार करते हैं। निंदा प्रस्ताव पास होते हैं। महाशक्तियां बयान जारी करती हैं। पर जमीनी स्तर पर एक भी जान नहीं बच पाती। यह पूरी वैश्विक व्यवस्था की नाकामी को दर्शाता है।
लेबनान की चरमराती अर्थव्यवस्था और मानवीय संकट
युद्ध सिर्फ़ इमारतें नहीं गिराता। वह पूरे देश की रीढ़ तोड़ देता है। लेबनान पहले से ही गंभीर आर्थिक मंदी से जूझ रहा था। वहां की करेंसी की वैल्यू पहले ही खत्म हो चुकी थी। अब इस युद्ध ने बचे-खुचे ढांचे को भी तबाह कर दिया है। 3,000 से ज़्यादा लोगों की मौत सिर्फ एक सरकारी आंकड़ा नहीं है। यह 3,000 परिवारों की तबाही है। कमाने वाले हाथ चले गए हैं। बच्चे अनाथ हो चुके हैं।
लाखों लोग दक्षिण लेबनान से भागकर बेरुत और उत्तरी इलाकों में शरण ले रहे हैं। स्कूलों को शेल्टर होम बना दिया गया है। वहां पैर रखने की जगह नहीं है। पीने का साफ पानी नहीं है। सर्दियों का मौसम स्थिति को और बदतर बना रहा है। बिना हीटिंग और पर्याप्त कपड़ों के लोग ठिठुरने को मजबूर हैं। वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन (WHO) ने चेतावनी दी है कि अगर ये हालात जारी रहे, तो महामारी फैलने का खतरा बढ़ जाएगा।
इस संकट का एक और स्याह पहलू है। सहायता सामग्री ले जा रहे ट्रकों को भी सुरक्षित रास्ता नहीं मिल पा रहा। सुरक्षा कारणों से कई अंतरराष्ट्रीय रिलीफ एजेंसियां अपने कदम पीछे खींच रही हैं। जो थोड़ी-बहुत मदद पहुंच भी रही है, वह ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। स्थानीय लोग पूरी तरह से आपस में एक-दूसरे की मदद पर निर्भर हैं।
वैश्विक ताकतों का दोगलापन और कूटनीतिक विफलता
इस पूरे संघर्ष में दुनिया के बड़े देशों का रवैया बेहद निराशाजनक रहा है। अमेरिका लगातार इज़रायल को हथियार सप्लाई कर रहा है। साथ ही वह शांति की बातें भी करता है। यह दोहरा रवैया ही इस युद्ध को लंबा खींच रहा है। जब तक हथियारों की सप्लाई नहीं रुकेगी, तब तक बारूद बरसता रहेगा। यूरोपियन यूनियन के देश भी सिर्फ़ चिंता जताने से आगे नहीं बढ़ पा रहे।
दूसरी तरफ ईरान हिजबुल्लाह का समर्थन करता है। वह इसे अपनी क्षेत्रीय लड़ाई का हिस्सा मानता है। इस भू-राजनीतिक खेल में मोहरे लेबनान के बेकसूर लोग बन रहे हैं। कोई भी पक्ष झुकने को तैयार नहीं है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठकें बेनतीजा खत्म हो जाती हैं। वीटो पावर का इस्तेमाल करके फैसलों को रोक दिया जाता है। यह कूटनीति की सबसे बड़ी विफलता है।
इतिहास गवाह है कि जब भी किसी देश में इस तरह का वैक्यूम पैदा होता है, उग्रवाद और पैर पसारता है। लेबनान में भी यही डर है। अगर सरकार और सेना पूरी तरह नाकाम हो गईं, तो अराजकता का नया दौर शुरू हो जाएगा। सीज़फायर के नाम पर दुनिया को धोखा दिया जा रहा है। असलियत यह है कि युद्ध विराम का मतलब सिर्फ हमलों की तीव्रता को कुछ समय के लिए धीमा करना बनकर रह गया है, पूर्ण शांति नहीं।
इस स्थिति से बाहर निकलने का रास्ता बेहद कठिन है। सिर्फ़ कागजी सीज़फायर से काम नहीं चलेगा। इसके लिए एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय दबाव की जरूरत है। इज़रायल को अपनी सैन्य कार्रवाई तुरंत रोकनी होगी। साथ ही हिजबुल्लाह को भी बातचीत की मेज पर आना होगा। सबसे पहला कदम मानवीय सहायता को बिना किसी बाधा के प्रभावित इलाकों तक पहुंचाना होना चाहिए। इसके बाद ही किसी स्थायी राजनीतिक समाधान के बारे में सोचा जा सकता है। दुनिया मूकदर्शक बनकर एक पूरे देश को मिटते हुए नहीं देख सकती। तुरंत और कड़े कदम उठाना ही एकमात्र विकल्प बचा है।